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गुरूर्ब्रहमा गुरूर्विष्णु। गुरूर्द्रेवो महेश्वीर: ।
गुरू: साक्षात् परम् ब्रहम तस्मैद श्री गुरवेनम:।।
’ विद्ययाडमतमश्नु्ते ‘
ऊँ सह नाववतु । सह नौ भनक्तु‘ ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्विना वधीतमस्तुत मा विद्धिषाव है ।।
ऊँ शान्ति : । शान्ति : । शान्ति : ।
आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्व।त: ।
न चौरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातभाज्यं न च नित्य मेंव ।
व्य्ये कते वर्दते नित्य मेव विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ।।
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  कॅालेज का इतिहास  
 

          स्वतंत्रता प्राप्ति मे बाद बिहार की राजधानी पटना में राज्य सरकार द्धारा स्त्री शिक्षा को बढावा देने के लिए दो महिला महाविधालयों की स्थापना करने का निर्णय लिया गया था । इस दिशा में पहल करते हुए सरकार ने प्रथम महिला महाविधालय , राजकीय महिला महाविधालय ,गुलजारबाग के नाम से पुण्य सलिला गंगा के पावन व रमणीय तट पर स्थित '' बेतिया हाउस '' उर्फ बी0एन0आर0 परिसर में 1 जून 1973 को स्थापित किया था । महिला महाविधालय का अभाव रहने के कारण सरकार के इस सराहनीय कार्य से इस क्षेत्र के घर-घर में हर्ष और आशा की लहर दौड गई । इस परिसर में पहले से ही बालिकाओं के लिए दसवीं कक्षा तक की i<+kbZ के लिए विधालय और टीचर ट्रेनिंग कॉलेज चल रहा था । बी0एन0आर0 टेनिंग कॉलेज की प्राचार्या श्रीमती हुस्न आरा रिजवी को राजकीय महिला महाविधालय , गुलजारबाग की प्रथम प्राचार्या का दायित्वपूर्ण प्रभार प्राप्त हुआ । उन्होंने एक साथ दोनों कॉलेजों की प्राचार्या का कठिन दायित्व निभाया । उनकी सहायता के लिए तीन कार्यालय सहायकों की नियुक्ति हुई । यह इस क्षेत्र के लोगों की शिक्षा पाने की ललक का ही प्रमाण है कि व्याख्याताओं की विधिवत नियुक्ति से पूर्व ही काफी संख्या में छात्राओं का नामांकन करना पडा । अध्यापन का काम औपबंधिक व्यवस्था के तहत बी0एन0आर0 टेनिंग कॉलेज की सक्षम अध्यापिकाओं से कराया जाने लगा ।

      स्थापना के पाँच माह बाद नवम्बर 1973 ई0 को शिक्षा विभाग द्धारा विधिवत नियुक्त होकर उर्दू विभाग में श्रीमती तैयबा खातून , राजनीति शास्त्र विभाग में इंदू सिन्हा , अर्थशास्‍्त्र विभाग में श्रीमती उर्मिला सिंह , प्राणि विज्ञान विभाग में श्रीमती अपराजिता श्रीवास्तव , इतिहास विभाग में श्रीमती आशा कुमारी , अंग्रजी विभाग में श्रीमती भ्रमर चैधरी , बंगला विभाग में श्रीमती मिनती मित्रा , दर्शन शास्‍त्र विभाग में सुश्री कृश्‍णा बनर्जी  , वनस्पति विज्ञान विभाग में श्रीमती स्नेह प्रभा  एवं भौतिकी विज्ञान विभाग में श्रीमती सुमित्रा बराट ने योगदान देकर शिक्षण कार्य को सुचारु तथा नियमित रुप से प्रारंभ किया । महाविधालय में छात्राए अब दिन प्रतिदिन बढने लगीं ओैर अन्य विषयों की पढाई की आवश्‍यकता महसूस होने लगी । शिक्षा के प्रति सचेत एवं सचेष्ट सरकार ने इसी क्रम में सन 1974 में रसायन शास्त्र विभाग में श्रीमती नुजहत अमीर , मनोविज्ञान विभाग में श्रीमती पूर्णिमा प्रसाद तथा दर्षन शास्त्र विभाग मेरी एम्मा कुलता एक्का की नियुक्ति व्याख्याता पद पर की । जिन विषयों में व्याख्याताओं की नियुक्ति नहीं हुई थी उन विषयों की पढाई सरकार के निर्देषानुसार अन्य शिक्षण संस्थाओं के प्राध्यापकेां द्धारा कराई जाने लगी । परंतु यह व्यवस्था छात्राओं के लिए पर्याप्त नहीं थी । महाविधालय में प्रयोगशाला ,प्रयोगशाला सहायकों , पुस्तकालय ,भंडारपाल, उपकरणों एवं चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों का अभाव था । इस प्रतिकूल परिस्थिति में भी प्रभारी किन्तु कर्मठ प्राचार्या श्रीमती हुस्न आरा रिजवीं के कुशल नेतृत्व में तत्कालीन व्याख्याताएँ और कर्मचारीगण महाविधालय के सर्वांगीण विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहे ।

                       फरवरी 1975 में श्रीमती रिजवी के सेवा विरमित होने पर श्रीमती भांति उपाध्याय , उप-शिक्षा निदेशक ने लगभग एक माह तक अपने मूल कार्य के अतिरिक्त महाविधालय की प्राचार्या का कार्य भार संभाला । तत्पश्‍चात विभागीय आदेश से बी0एन0आर0 टेªनिंग कॉलेज की तत्कालीन प्राचार्या श्रीमती विधावती माथुर ने महाविधालय प्राचार्या का अतिरिक्त कार्यभार ग्रहण किया । इस वर्ष हिन्दी विभग में श्रीमती ललितांषुमयी और 1976 ई0 में गृहविज्ञान व अंग्रेजी विभाग में क्रमश: श्रीमती सरिता रोहतगी एवं श्रीमती मेरी जोसेफ की नियुक्ति व्याख्याता पद पर हुई ।

                    25 मई 1976 को महाविधालय की पूर्णकालिक प्राचार्या के रुप में बिहार लोक सेवा आयोग द्धारा अनुशसित डॉ0 श्रीमती रितम्भरी देवी ने पदभार ग्रहण किया । इनके कुशल सुनियोजित एवं दक्ष नेतृत्व में महाविधालय का विकास हुआ । पूर्व से संचालित बुक बैंक एक पुस्कालय का रुप प्राप्त कर सका । आज इस पुस्तकालय में 10,892 पुस्तकें है ।सन 1981 में नियमित पुस्तकाध्यक्ष की नियुक्ति हुई । सचेत अभिभावकों के अनुरोध पर 1975 ई0 से यहाँ कला स्नातक की पढाई शुरु हो गई थी और 1981 ई0 से विज्ञान स्नातक की भी पढाई शुरु हो गई । 1979 ई0 में अब तक रिक्त चल रहे गणित विभाग में सुश्री मिनती रॉय की नियुक्ति व्याख्याता पद पर हुई । अप्रैल 1981 ई0 में शि‍क्षा विभाग द्धारा हिन्दी विभाग में श्रीमती भोषा धोश , मनोविज्ञान विभाग में श्रीमती इफफत फातिमा , इतिहास विभाग में श्रीमती विजया लक्ष्मी सिन्हा, उर्दू विभाग में श्रीमती राजिया बानों की नियुक्ति व्याख्याता पद पर हुई । इसक अतिरिक्त तीन नए विषयों क्रमश: समाजशास्त्र ,संस्कृत तथा संगीत की पढाई भी शुरु हुई । इन विभागों में क्रमश: सुश्री पी0 पुष्पा , श्रीमती महश्‍वेता महारथी तथा श्रीमती पुष्पा श्रीवस्तव की नियुक्ति व्याख्याता पद पर हुई । सन 1988 में त्रि-वर्षीय स्नातक पाठयक्रम शुरु होने के साथ-साथ कला संकाय के सभी विषयों में तथा विज्ञान संकाय में वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान और गणित में प्रतिष्ठा की पढाई आरंभ हो गई । जबकि रसायन विज्ञान में प्रतिष्ठा की पढाई सन 1995 से शुरु हो पायी ।

                 अप्रैल 1981 में कला संकाय के प्रत्येक विषय में एक-एक व्याख्याता की नियुक्ति शिक्षा विभाग द्धारा की गई । इसके अतिरिक्त तीन नये विषय क्रमश: समाजशास्त्र संस्कृत एवं संगीत की पढाई भी प्रारंभ हुई । सन 1988 में त्रिवर्षीय स्नातक पाठयक्रम शुरु होने के साथ-साथ कला के सभी विषयों में तथा वनस्‍पति विज्ञान होने के साथ-साथ कला के सभी विषयों में तथा वनस्‍पति विज्ञान,प्राणि विज्ञान एंव गणित में प्रतिष्‍ठा की पढाई शुरू हो गई ।  

              महविधालय के प्रगति तथा स्थायित्व के आलोक में तत्कालीन प्राचार्या डॉ0 श्रीमती रितम्भरी देवी के अथक प्रयास से सन 1983 जनवरी में विश्‍वविधालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्धारा महाविधालय को आयोग द्धारा यथोचित अनुदान प्राप्त हुआ जिससे प्रयोगशाला उपकरण , पुस्तकालय के लिए पुस्तकें तथा सामान्य कक्ष के लिए टी0वी0 एवं बी0सी0आर0 आदि का क्रय हुआ ।सन 1989 में भूगोल विभाग में स्नातक स्तरीय पढाई शुरु होने के साथ भूगोल विभाग का श्रीगणेश हुआ ।

             सीमित संसाधन और असीम संभावनाओं एवं लगन के साथ महाविधालय अपनी छात्राओं को विधादान करने लगी । महाविधालय के भवन निर्माण के लिए बिहार सरकार द्धारा गाँधी सेतु से पश्चिम संदलपुर ग्राम में पाँच एकड भूमि दिनांक 27.07.1989 को आवंटित हुआ । परंतु कुछेक तकनीकी पेंचीदागियों के कारण उसपर भवन निर्माण का कार्य संपन्न नहीं हो पाया ।

           24 फरवरी 1995 को प्राचार्या श्रीमती रितम्भरी देवी विशेष निदेशक माध्यमिक शिक्षा के पद पर सुशोभित हुई तथा विभागीय निर्देष से महाविधालय की ही हिन्दी की व्याख्याता डॉ0 ललितांषुमयी ने प्राचार्या का पदभार ग्रहण किया । आगे चलकर जून 1997 को इन्हें बिहार लोक सेवा आयोग द्धारा भी अनुशंसा प्राप्त हो गई । वर्ष के प्रारंभ में प्रत्येक विषय में आवष्यकतानुरुप व्याख्याताओं को नियुक्ति भी बिहार लोक सेवा आयोग द्धारा की गई । इतना ही नहीं भूगोल प्रतिष्ठा तथा वाणिज्य संकाय का भी श्रीगणेश हुआ ।

          सन 1998 महाविधालय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इस वर्ष जहाँ महाविधालय अपना पच्चीसवॉ साल पूरा करने जा रहा था ,वहीं अठारह नई व्याखाऍ भी महाविधालय को प्राप्त हुई । (हिन्दी विभाग में उषा यादव, अनिता एक्का ,भूगोल में जयश्री एवं प्रभा कुमारी ,संस्कृत में रंजू कुमारी ,राजनीति शास्त्र में सगीता विश्‍वनाथ तथा मंजू कुमारी , इतिहास में सुनीता रंजन टोप्पों ,अर्थशास्त्र में अनिता मिंज , वनस्पति शास्त्र में फरहत शमीम व किरण कुमारी ,जन्तु विज्ञान में विधुरानी सहाय सिंह, भौतिकी विज्ञान में इला ,गणित में सबीहा अहसन मनोविज्ञान में आयषा बानों , दर्षनशास्त्र में पूनम कुमारी ,वाणिज्य संकाय में श्रुति तेतरवे एवं सुनिता कुमारी ,1999 में सगीत विभाग में रंजीता, अंग्रेजी विभाग में विनीता कुमारी , 2001 में कुमारी निमिषा तथा 2006 में विमला पॉल एवं कुमारी मणि सिंह ) महाविधालय में कुल पैंतालीस व्याख्याताए हो गई थी । जिनके सान्निध्य छात्राए अपनी ज्ञान पिपासा संतुष्ट करने लगीं । महाविधालय अब सही मायनों में युवा हो गया था ।

                नवंबर माह 1998 में धुमधाम से रजत जयंती समारोह का आयोजन हुआ जिसमें तत्कालीन महामहिम राज्यपाल ,श्री सुन्दर सिंह भंडारी मुख्य अतिथि थे ।

                  प्राचार्या डॉ0 श्रीमती ललितांशुमयी के साथ अब योग्य एवं कर्मठ शिक्षिकाएँ थी । उन्होंने छात्राओं के सर्वागीण विकास हेंतु विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयेाजन प्रारंभ किया । वर्ष 2005 में एन0सी0सी की इकाई स्थापित हुई जिसकी प्रभारी लंफिटनेन्ट रंजीता है । एन0सी0सी0 के माध्यम से छात्राओें को मानो विस्तृत आकाष मिल गया । बगल की दूकान तक भी भाई के साथ जाने वाली लडकियाँ एन0सी0सी0 कैन्डेट बनकर देश का कोना-कोना घुम आई । एन0सी0सी ने लडकियाँ को आत्मनिर्भर एवं निर्भिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । यह क्रम आज भी निर्बाध गति से चल रहा है । प्राचार्या डॉ0 ललितांशुमयी के सेवानिवृत होने के बाद सन 01.11.2004 में महाविधालय की ही मनोविज्ञान की व्याख्याता डॉ0 पूर्णिमा प्रसाद ने महाविधालय को संभालने और प्रगति के प्रशस्त पथ पर आगे बढाने का दायित्व ग्रहण किया । महाविधालय की शैक्षणिक गुणवता बनाये रखने के साथ इन्‍होने हर संभव प्रयास किया कि महाविधालय का अपना स्वतंत्र भवन व परिसर बन जाए । महाविधालय पत्रिका 'प्रज्ञा' के विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि तत्कालीन शिक्षामंत्री माननीय श्री वृशिण पटेल जी ने भवन निर्माण हेतु 14 करोड रुपये देने का घेाषणा की थी । कार्य प्रारंभ करने के लिए उन्होंने 1 करोड रुपये भी निर्गत करने का आदेश दे दिया था । परंतु दुर्भाग्यवश महाविधालय को आवांटित भूखण्ड के अधिग्रहण में कुछ तकनीकी समस्याएँ सामने आई और भवन निर्माण का कार्य प्रारंभ न हो सका । डॉ0 पूर्णिमा प्रसाद की सेवानिवृत के बाद प्राचार्या पद की महती जिम्मेदारी गृहविज्ञान की व्याख्याता डॉ0 सरिता रोहतगी ने सहर्ष स्वीकार किया ।

            परिर्वतन प्रकृति का शाष्वत नियम है वर्ष 2010 से बिहार के उच्च शिक्षा में विशेष परिर्वतन देखने को मिलता है । तत्कालीन शिक्षा मंत्री, माननीय श्री हरि नारायण सिंह एवं सरकार की इच्छा के अनुरुप दोनों महिला महाविधालयों को अत्याधुनिक तकनीक से लैंस करने का कार्य प्रारंभ हुआ । इस दिशा में हमारे महाविधालय को 35 कम्प्यूटर , 9 एल0सी0डी0 प्रोजेक्टर , 9 पुल डाउन स्क्रीन , इंटरनेट कनेक्‍शन ,प्रिंटर मशीन उपलब्ध कराया गया । छात्राओं व कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए बायोमेट्रिक मशीन लगाये गये । 18 मई 2010 महाविधालय ही नहीं बल्कि पूरे बिहार के लिए गौरव का दिन था । इस दिन राज्य के प्रथम राजकीय महिला महाविधालय में बायोमेट्रिक मशीन व 35 कम्प्यूटर से सुसज्जित संगणक कक्ष का उदघाटन हुआ।यह वह दिन था जिस दिन से महाविधालय ने समय की माँग के अनुरुप अपने को अघतन करने का संकल्प लिया ।

         अब महाविधालय में पारंपरिक विषयों की पढाई के अतिरिक्त व्यावसायिक पाठयक्रमों में भी पढाई शुरु हो गई । मगध विश्‍वविधालय से सम्बद्धता प्राप्त कर त्रिवर्षीय बी0सी0ए0 की पढाई शुरु हुई । इसके अलावा अल्पकालीन डिप्लोमा पाठयक्रमों की पढाई भी प्रारंभ हुई । प्रत्येक प्रायोगिक विषय वाले विभागों को कम्प्यूटर व प्रिंटर उपलब्ध कराया गया । कार्यालय में भी कार्यो को गति देने के लिए कम्प्यूटर लगाये गए । इस प्रकार आधुनिकीकरण एवं कम्प्यूटरीकरण का कार्य प्रारंभ हुआ । शिक्षा की गुणवता में सुधार लाने के लिए छात्राओं को यू0जी0सी0 योजना के अंतर्गत रेमेडियल वर्ग की सुविधा प्रदान की गई । इससे छात्राओं को बहुत ही लाभ पहुँचा ।

          राज्य सरकार की विभिन्न छात्रत्रृति योजनाएँ भी महाविधालय में चल रही है । विकास का पहिया आगे बढ रहा था लेकिन एक कसक सबके मन में है कि कब हमारा अपना महाविधालय भवन तैयार होगा ? आशा जीवन को गति देने वाली अचूक बूटी है मन में आस और सरकार पर विश्‍वास रखकर हम कर्तव्यनिष्ठ व्याख्याताएँ अपना सर्वोतम योगदान महाविधालय को दे रही है ।

           कहते है भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता । समय का चक्र बढता गया और 31.05.2011 को प्राचार्या डॉ0 सरिता रोहतगी सेवानिवृत हो गई ।

         01.06.0211 को विकास के पथ पर अग्रसर महाविधालय को संभालने की जिम्मेवारी महाविधालय की इतिहास विषय की व्याख्याता डॉ0 विजयालक्ष्मी सिन्हा को प्राप्त हुआ । इन्‍होने पूर्ववर्ती प्राचार्यो की कल्याणकारी कार्य करते रहने की परंपरा के तहत छात्रओं को और अधिक सुविधा उपलब्ध कराते हुए बैंक ,प्रशासनिक सेवा एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में लाभदायक कोचिंग क्लास की शुरुआत की । इसके लिए शहर के प्रतिष्ठित एंव योग्‍य शिक्षकों को मानदेय पर महाविधालय में वर्ग लेने एंव छात्राओं को उचित मार्गदर्शन देने के लिए आमंत्रित किया गया । इन वर्गो में छात्राओं की भारी संख्या इस बात का प्रमाण है कि महाविधालय छात्राओं की अपेक्षा पर खरा उतर रहा है । प्राचार्या की इस मुहिम को और अधिक गति तब मिली जब यहाँ स्व-पोषित पाठयक्रम की भी शुरुआत हो गई।वर्तमान में इस तरह के पाठयक्रम के अंतर्गत बी0सी0ए0 का दूसरा सत्र प्रारंभ हो चुका है ।

          प्रतिवेदन लिखे जाने तक में यहाँ बी0एड0 की पढाई शुरु करने के लिए निरीक्षण आदि आवश्‍यक कार्यवाही प्रारंभ हो चुकी है । जल्द ही यहाँ बी0एड0 की भी पढाई शुरु हो जाएगी ऐसी आशा है ।

             हाल ही में महाविधालय का चयन आई0आई0टी0 मुबई द्धारा कम्प्यूटर प्रशिक्षण देने के लिए किया गया है । बिहार के सिर्फ तीन महाविधालय का चयन आई0आई0टी0 ने किया है और हमारा महाविधालय इनमें से एक है । यह महाविधालय के लिए अत्यंत हर्ष व गौरव की विषय है ।

          महाविधालय के गौरवशाली अध्याय में एक और अध्याय जोडते हुए हमारे निदेशक उच्च शिक्षा सीताराम सिंज जी ने महाविधालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन करने की प्रेरणा दी । उनके अथक प्रयास एवं मदद से महाविधालय में पहली यू0जी0सी0 संपोषित तीन-तीन राष्ट्रीय सेमिनार हो रहे हैं । महाविधालय परिवार विशेषकर हिन्दी विभाग उनके प्रति आभार प्रकट करता है और स्वंय को गौरवांवित अनुभव करता है । संगोष्ठी की तैयारियों के बीच ही हमें एक और खुशखबरी मिली कि राज्य सरकार द्धारा आवंटित भू-खण्ड को अतिक्रमण मुक्त करा दिया गया है । प्राचार्या ने भवन निर्माण की आवश्‍यक  प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है । हमें पूर्ण आशा है कि यथाशीघ्र हम अपने नवनिर्मित महाविधालय परिसर में छात्राओं की किलकारी सुनेंगे , अठखेलियाँ देखेंगे । वो बहुत सारी गतिविधियाँ जिन्हें हम स्थानाभाव के कारण संपन्न नहीं कर पाते थे , अपने नये भवन में कर पायेंगे और तब महाविधालय संभावनाओं के असीम आकाश में पंख पसारे उन्नति की नित नई कहानियाँ लिखेगा । अपने अभिभावक विभाग से हमें उम्मीद है कि नवीन भवन के साथ-साथ आवश्‍यक एवं पर्याप्त संख्या में व्याख्याताएँ कार्यालय कर्मचारी और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी भी प्राप्त होगें ताकि महाविधालय छात्राओं को और अधिक बेहतर तरीके से शिक्षा प्रदान कर सके और महाविधालय का नाम स्वर्णाक्षरों में अमिट हो सकें ।

 
     

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